Sunday, May 10, 2020

मेरा बचपन

मेरा जन्म अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में आर के मिशन हॉस्पिटल में हुआ। मेरे पिता श्री रामेश्वर माहेश्वरी जी का वहां व्यापार था। मूल रूप से हम राजस्थान के नागौर जिले के श्री बालाजी गाँव से हैं परंतु व्यापार के लिए पिताजी गाँव छोड़ बाहर रहने लगे। माताजी श्रीमती सावित्री देवी धार्मिक घरेलू महिला हैं।

शिक्षा नार्थ लखीमपुर (आसाम) के शंकर देव स्कूल से प्रारम्भ हुई परन्तु उस समय आसाम में उल्फा उग्रवादियों के कारण स्थिति ठीक नही थी जिस कारण ताऊ जी ने हम सबको लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) बुला लिया। यहां मेरा नाम कुंवर खुशवक्त राय शिशु विद्यालय में कक्षा 2 में लिख गया। बड़े भाई हरि तापड़िया और मैं साथ में विद्यालय जाते। कुछ समय बाद छोटे भाई पंकज और बहन पिंकी का नाम भी उसी विद्यालय में लिखा दिया गया।

पढ़ने में ठीक था जिस वजह से कई प्रतियोगिताओं में पुरस्कार मिलता रहता था। पिता जी ने यहाँ कोरियर व्यवसाय शुरू किया जिस कारण उनको प्रतिदिन लखनऊ जाना पड़ता था। एक किराये के कमरे में हम सब रहते, आर्थिक स्थिति अच्छी नही थी या यूँ कहें कि बहुत ख़राब थी परंतु पिताजी और माता जी ने कभी हमे इस बात का एहसास नही होने दिया। पर उम्र के साथ साथ समझ स्वतः आने लगी। 

कुंवर खुशवक्त राय विद्यालय से कक्षा 8 पास करने के बाद मैंने स्वतः ही अपना दाखिला धर्म सभा इण्टर कालेज में कक्षा 9 में वाणिज्य विषय के साथ करवा लिया। 15 वर्ष की उम्र और कॉलेज में मिली आजादी बिगड़ने के लिए काफी थी। कॉलेज जाने के बाद पहली क्लास अटेंड करके सीधे फील्ड में खेलने भाग जाता। गिल्ली डंडा प्रिय खेल हुआ करता था। जब खेल कर थक जाता तो मित्रों के साथ कॉलेज के बाहर शरबत, चाट, पॉपकॉर्न खा लेते। कॉलेज में मुझे सतविंदर सिंह, कंवलजीत सिंह, यज्ञ, ज्ञानेंद्र जैसे अच्छे मित्र मिले। पढाई में ध्यान ना देने के कारण क्लास में टॉप रहने वाला बालक कक्षा 9 की अर्धवार्षिक परीक्षा में सभी विषयों में फेल हो गया। उस दिन एहसास हुआ की मैंने गलतियां की है। तब से पढ़ने में मन लगाया और 9वीं पास कर 10वीं में आ गए। 

10वीं में राह और कठिन नजर आ रही थी यूपी बोर्ड में दशवीं की परीक्षा बहुत कठिन हुआ करती थी, लोगों से एक ही बात सुनने को मिलती की बोर्ड परीक्षा है ध्यान से पढ़ो। पढाई में ध्यान लगाते हुवे गणित की ट्यूशन श्री कृष्ण मुरारी गुप्ता सर के पास शुरू की। कॉमर्स अजय गुप्ता भैया से पढ़ते। अंततः परीक्षाएं शुरू हुई, ये मेरे लिए जीवन में प्रथम पर कुछ कर दिखने के चैलेंज जैसा था। अपना 100 प्रतिशत देते हुवे परीक्षाएं दी परन्तु सहपाठियों और लोगों की बातों से भय बहुत ज्यादा था। 10वीं में बोर्ड एक्जाम का भय इतना था कि उस परीक्षा का रोल नम्बर आज भी याद है। फिर वो दिन आया जब परीक्षाफल आना था। उन दिनों अख़बार आता था जिसमे पास हुवे विद्यार्थियों के रोल नम्बर छपे होते थे। शाम 7 बजे अख़बार मिला और कई सहपाठी फेल हो गए थे। मैं खुशकिस्मत था, द्वितीय श्रेणी से पास हो गया। कुछ दिन बाद कॉलेज से अंकपत्र मिला तो ख़ुशी हुई की गणित में जिले में सर्वाधिक अंक 100 में से 90 मुझे मिले थे। खैर पढाई आगे बढ़ी और 11वीं में आ गया। इसी बीच पिताजी ने हमारे लिए लोन पर एक कंप्यूटर लिया जो की पापा के दफ्तर में था। ऑफिस जाकर पापा की मदद करता और कंप्यूटर भी सीखने लगा। वाणिज्य विषय से पढाई कर रहा था तो टैली एकाउंटिंग भी सीख ली। 12वीं भी अच्छे अंकों के साथ पास कर ली।
आगे का अगली पोस्ट में.....✍️

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