Thursday, May 14, 2020

घर घर महाभारत - कारण और निवारण

आज के आधुनिक युग में परिवारों में आपसी मतभेद आम बात हो गई है ये मतभेद कुछ समय में मनभेद में बदल जाते हैं। यहाँ तक भी देखा गया है कि परिवार में ही लोग एक दूसरे की जान तक ले लेते हैं। इसके पीछे क्या कारण है ? 

आमतौर पर युवा माता - पिता जिनके बच्चे छोटे हैं या अनजाने में एक छोटी से गलती करते हैं जो बड़ा रूप ले सकती है। अक्सर देखा गया है जब दो या दो से ज्यादा बच्चे होते हैं तो किसी एक बच्चे पर थोड़ा अधिक स्नेह होता है जिस कारण अन्य बच्चे की थोड़ी से अनदेखी भी उसके मन-मस्तिष्क पर असर कर जाती है। कभी बिना गलती एक को डांट दिया और दूसरे को प्रेम से समझा दिया इस तरह की मामूली सी गलती अक्सर सभी माता पिता से हो जाती है जो की वो स्वयं भी जान नही पाते। इस तरह की गलती जीवन की किसी भी पड़ाव में हो सकती है जो की माता पिता जान नही पाते पर बच्चे के मस्तिष्क पर ये बड़ा असर करती है जोकि बच्चे के बड़े होने के साथ साथ गंभीर होती जाती है। 

धृतराष्ट्र 99 पुत्रों को अनदेखा कर सिर्फ कपटी स्वभाव वाले दुर्योधन के मोह में डूबे रहे जिस कारण महाभारत हुई और उनका सर्वस्व विनाश हो गया। धृतराष्ट्र जैसी गलती जीवन के किसी भी पड़ाव में हो सकती है इस समस्या का निवारण भी यही है कि अगर आप माता पिता है तो आत्मचिंतन करें कि कहीं आपसे इस तरह की कोई गलती तो नहीं हो रही है। कई माता-पिता यहां पर तर्क देंगे कि माँ बाप  के लिए सभी बच्चे समान होते हैं। मैं भी मानता हूँ कि माँ बाप के लिए सभी बच्चे समान होते हैं इसीलिए मै बार बार कह रहा हूँ कि 90 प्रतिशत माता पिता से ऐसी गलतियां अनजाने में होती हैं, 10 प्रतिशत माता पिता सब जानते हुवे भी अनजान बने रहते हैं। यह भी देखा गया है कि कम बोलने वाला बच्चा कभी अपनी बात सही से रख नही पाता और मन मारकर बैठ जाता है, खैर। 

ये बात तो हो गई माता पिता की परन्तु ऐसा नही है कि गलती सिर्फ माता पिता की ही हो। कई बार बच्चों से भी गलतियां होती है और ये अक्सर परिवार बढ़ने के साथ शुरू होती हैं जब माता पिता बुजुर्ग हो जाते हैं, बच्चों का विवाह होने के बाद सब अपने और पत्नी बच्चों के बारे में अधिक स्नेह रखते हैं, हालाँकि माता पिता के लिए उनका प्रेम कभी कम नही होता। सास बहू के मतभेद भी लड़कों को झेलने पड़ते हैं। 

संयुक्त परिवार में जब एक बहू रसोई में सबको पराठे का नाश्ता दे रही है और उसके मन में विचार आता है कि अपने पति को या अपने बच्चे को थोड़ा अच्छा पराठा सेक कर दे दूं। बस इसी क्षण मतभेद की नींव पड़ जाती है। विचार शब्दों में बदल जाते हैं फिर शब्द बातचीत में और बातचीतों से मतभेद आरम्भ हो जाते हैं। सभी को प्रयास करना चाहिए कि ऐसे विचार मन में आते ही उसे तुरंत दिमाग से निकाल दें। 

बुजुर्ग माता पिता को बेटा बहू और पोता पोतियों की तुलना करने से बचना चाहिए साथ ही बेटा बहू की भी जिम्मेदारी बनती है कि अपने बच्चों की तुलना घर के अन्य बच्चों से ना करे। 

चापलूसी स्वभाव की पहचान: प्रत्येक घर में कुछ सदस्य ऐसे अवश्य होते हैं जिनका स्वभाव चापलूसी का होता है, घर के मुखिया को इसे पहचान कर सतर्क रहे क्योंकि इसका सीधा असर अन्य लोगों के साथ के रिश्तों पर पड़ता है। 

गिनती हमेशा एक से शुरू होती है इस जल्दी ना रोक जाये तो हालात बहुत जल्दी बिगड़ने लगते हैं, बिलकुल कोरोना वायरस की बीमारी की तरह। घर का वातावरण खुशमय बनाये रखने के लिये बहुत सी बातों का ध्यान रखना चाहिए

🔸यदि आप घर में छोटे हैं तो बड़ों को सम्मान देने में लापरवाही ना करें। 

🔸यदि आप बड़े हैं तो छोटों को बराबर स्नेह देवें।

🔸धृतराष्ट्र की तरह किसी एक पुत्र के मोह में अंधे ना बने, इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

🔸घर जे सभी सदस्य घर के सभी छोटे बच्चों को बराबर स्नेह देवें। तुलना ना करें, इससे बच्चों में हीन भावना जन्म लेती है।

🔸किसी सदस्य की कोई बात ठीक नही लगी हो तो सीधे उससे पूछकर बात को क्लियर करना चाहिए। सुनी सुनाई बातों को सच ना मानें।

🔸इन-डायरेक्ट रूप से सोशल मीडिया पर घर के किसी सदस्य पर तंज ना कसें। सभी समझदार हैं बातों का अर्थ निकालने में समय नही लगता। 

🔸कोरोना वायरस की बीमारी से ये तो समझ गए होंगे की जीवन का कोई भरोसा नही कब अंत समय आ जाये तो फिर मतभेद मिटाकर प्रेम से रहें।

🔸छोटी छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखें। 

🔸संयुक्त परिवार में हैं तो कुछ भी पृथक से करने या कुछ छिपाने के विचार बड़ी तबाही कर देते हैं, इससे बचें।

अंत में यही कि मैं कोई लेखक नही हूँ सिर्फ अपने विचार लिखने का प्रयास किया है। कही कोई त्रुटि हो तो क्षमा करें। 
..मिलते हैं फिर से...✍️

Tuesday, May 12, 2020

रिश्तों की मार्केटिंग

जी हाँ बिलकुल सही पढ़ा आपने "रिश्तों की मार्केटिंग"। पहले मार्केटिंग और प्रचार सामान का होता था परंतु अब इसमें रिश्तों की मार्केटिंग का ट्रेंड जुड़ गया है। ये मार्केटिंग होती है सोशल मीडिया के माध्यम से। 

लोग दुनिया को ये बताने में अपना अधिक समय लगा रहे हैं कि वे अपने माता पिता, पत्नी, बच्चों आदि से कितना प्रेम करते हैं उनके संबंध कितने मधुर हैं जबकि वास्तव में वे जितना समय सोशल मीडिया से ये पोस्ट आदि में लगाते हैं उस समय का दशवां भाग भी इन रिश्तों को नही देते। 

"Me with sweet wife" या "My loving Husband" लिखकर फोटो फेसबुक पर पोस्ट करते हैं और लाइक्स कमेंट्स की राह देखते रहते हैं जबकि बहुत कम लोग ही अपने जीवनसाथी के साथ बैठकर उनसे बात करते हैं उनकी सुनते हैं।

याद है जब छोटे थे तो कोई चीज लेने के लिए पापा से जिद्द की थी और पैसे की कमी के बावजूद पापा ने आपकी ख़ुशी के लिए वो आपको दिला दी थी, माता पिता ने अपनी हर ख़ुशी गिरवी रखकर आपको खुश रखा। आपके लिए सब कुछ किया पर ये सब कभी किसी को नही बताया। और लोग आजकल 500 रूपये का उपहार अपने माता पिता को देकर उसका फोटो टैग करते हुवे हजारों लोगों को बताते हैं। 

लोगों का ध्यान रिश्तों से हटकर दिखावे पर केंद्रित है जिस कारण लोगों में दूरियां बढ़ती जा रही है लोग जितने सामाजिक दिखते हैं असल में वो अकेलेपन के शिकार होते हैं। 

मदर्स डे , फादर्स से आदि पर लोग फेसबुक पर झड़ी लगा देते हैं पोस्ट की पर बहुत से लोगों को मैं जानता हूँ जो असल जीवन में माता पिता से बहुत ही बत्तमीजी से पेश आते हैं। बाहर भंडारा लगाने में व्यस्त लोगों को घर में सामान लाते शर्म आती है या समय नही होता। हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले अंजान स्व मित्रता अच्छी बात है पर सवाल तब पूछना पड़ता है जब अपने घर के बड़ों का वे सम्मान नही करते। यह सच्चाई है आज के जीवन की। 

आज कोरोना महामारी के कारण लॉक डाउन में स्वादिष्ट पकवान बनाकर उनके फोटो फेसबुक पर पोस्ट कर रहे हैं। अच्छे पकवान बनाइये और खाइये इसमें कोई बुराई नही पर फोटो सार्वजनिक करके क्या दिखाना चाहतें हैं ये तो वे ही जाने।

"भोजन, भजन और नारी" पर्दे के है अधिकारी इस वाक्य का लोग स्वयं ही मजाक उड़ा रहे हैं और तीनों आज सार्वजनिक की जा रही हैं । यहां नारी के परदे से अर्थ है उसके पहनावे से है या उसकी ऐसी तस्वीरें जो पति-पत्नी के मध्य रहनी चाहिए वे लोगों तक ना पहुंचे।

मेरे इस पोस्ट की कई लोग आलोचना करेंगे क्योंकि सत्य को स्वीकार करने का साहस उनमे नही। उनकी आलोचना का मुझपर कोई फर्क नही पड़ता और ऐसे लोगों का भी मैं ह्रदय की गहराई से स्वागत करता हूँ। 

सभी को राम राम.. जल्द फिर मिलेंगे....✍️


Monday, May 11, 2020

डिग्री कॉलेज की पढाई और जीवन पथ का चुनाव

अब शहर के ही युवराज दत्त महाविद्यालय में बी.कॉम में दाखिला ले लिया था। वहाँ पढाई में ज्यादा मन नही लगा नए दोस्त बनते गये और छात्र राजनीति का मजा उठाने लगा पर एक चिंता मन ही मन सताती थी वो यह की आर्थिक आजादी कब मिलेगी ? कब तक किराये के मकान में रहेंगे ? इसी बीच लोगों को टैली एकाउंटिंग और कंप्यूटर सिखाने का कार्य शुरू किया। कुछ बड़ा करने का सपना लिए रोजगार तलाश रहा था साथ ही पिता जी के कूरियर व्यवसाय और बड़े भाई के ट्रेवल एजेंसी के व्यवसाय में हाथ बंटा रहा था। बी कॉम करने के बाद कुछ प्राइवेट फर्म के अकाउंट बनाने लगा पर इसमें भी ऐसे लोग मिले जिन्होंने कार्य करवाकर फीस पूरी नही दी। 

एम कॉम पूर्ण होते ही पिताजी ने दिल्ली में एक कम्पनी में नौकरी लगवा दी। कुछ समय वहाँ कार्य करने के बाद वापस आ गया नौकरी से सपने साकार होते नज़र नही आ रहे थे। वापस आने के बाद तनाव में रहने लगा, किस पथ पर जाना है कुछ समझ में नही आ रहा था। 

तभी एनएसडीएल पैन सेंटर लेकर पैन कार्ड बनाने का कार्य शुरू किया और भैया की सलाह से LLB करने का निश्चय किया। अब कुछ राह बनती दिखाई दे रही थी। आयकार का कार्य सीखने के लिए शहर के कुछ अधिवक्ताओं से संपर्क किया पर हर जगह निराशा हाथ लगी। फिर आयकार सम्बन्धी पुस्तकें पढ़ना शुरू किया और कुछ अच्छे लोगों से सलाह भी मिलने लगी। LLB पूर्ण होते होते सभी आयकर के सभी तरह के कार्य सीख चूका था। 

धीरे धीरे अच्छे क्लाइंट जुड़ते गए और आयकार अधिवक्ता के रूप में मेरी पहचान बनती गई। आर्थिक संकट भी ईश्वर कृपा से धीरे धीरे दूर होता गया। गत 8 वर्षों से कर अधिवक्ता के रूप में कार्य कर रहा हूँ। 

Sunday, May 10, 2020

मेरा बचपन

मेरा जन्म अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में आर के मिशन हॉस्पिटल में हुआ। मेरे पिता श्री रामेश्वर माहेश्वरी जी का वहां व्यापार था। मूल रूप से हम राजस्थान के नागौर जिले के श्री बालाजी गाँव से हैं परंतु व्यापार के लिए पिताजी गाँव छोड़ बाहर रहने लगे। माताजी श्रीमती सावित्री देवी धार्मिक घरेलू महिला हैं।

शिक्षा नार्थ लखीमपुर (आसाम) के शंकर देव स्कूल से प्रारम्भ हुई परन्तु उस समय आसाम में उल्फा उग्रवादियों के कारण स्थिति ठीक नही थी जिस कारण ताऊ जी ने हम सबको लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) बुला लिया। यहां मेरा नाम कुंवर खुशवक्त राय शिशु विद्यालय में कक्षा 2 में लिख गया। बड़े भाई हरि तापड़िया और मैं साथ में विद्यालय जाते। कुछ समय बाद छोटे भाई पंकज और बहन पिंकी का नाम भी उसी विद्यालय में लिखा दिया गया।

पढ़ने में ठीक था जिस वजह से कई प्रतियोगिताओं में पुरस्कार मिलता रहता था। पिता जी ने यहाँ कोरियर व्यवसाय शुरू किया जिस कारण उनको प्रतिदिन लखनऊ जाना पड़ता था। एक किराये के कमरे में हम सब रहते, आर्थिक स्थिति अच्छी नही थी या यूँ कहें कि बहुत ख़राब थी परंतु पिताजी और माता जी ने कभी हमे इस बात का एहसास नही होने दिया। पर उम्र के साथ साथ समझ स्वतः आने लगी। 

कुंवर खुशवक्त राय विद्यालय से कक्षा 8 पास करने के बाद मैंने स्वतः ही अपना दाखिला धर्म सभा इण्टर कालेज में कक्षा 9 में वाणिज्य विषय के साथ करवा लिया। 15 वर्ष की उम्र और कॉलेज में मिली आजादी बिगड़ने के लिए काफी थी। कॉलेज जाने के बाद पहली क्लास अटेंड करके सीधे फील्ड में खेलने भाग जाता। गिल्ली डंडा प्रिय खेल हुआ करता था। जब खेल कर थक जाता तो मित्रों के साथ कॉलेज के बाहर शरबत, चाट, पॉपकॉर्न खा लेते। कॉलेज में मुझे सतविंदर सिंह, कंवलजीत सिंह, यज्ञ, ज्ञानेंद्र जैसे अच्छे मित्र मिले। पढाई में ध्यान ना देने के कारण क्लास में टॉप रहने वाला बालक कक्षा 9 की अर्धवार्षिक परीक्षा में सभी विषयों में फेल हो गया। उस दिन एहसास हुआ की मैंने गलतियां की है। तब से पढ़ने में मन लगाया और 9वीं पास कर 10वीं में आ गए। 

10वीं में राह और कठिन नजर आ रही थी यूपी बोर्ड में दशवीं की परीक्षा बहुत कठिन हुआ करती थी, लोगों से एक ही बात सुनने को मिलती की बोर्ड परीक्षा है ध्यान से पढ़ो। पढाई में ध्यान लगाते हुवे गणित की ट्यूशन श्री कृष्ण मुरारी गुप्ता सर के पास शुरू की। कॉमर्स अजय गुप्ता भैया से पढ़ते। अंततः परीक्षाएं शुरू हुई, ये मेरे लिए जीवन में प्रथम पर कुछ कर दिखने के चैलेंज जैसा था। अपना 100 प्रतिशत देते हुवे परीक्षाएं दी परन्तु सहपाठियों और लोगों की बातों से भय बहुत ज्यादा था। 10वीं में बोर्ड एक्जाम का भय इतना था कि उस परीक्षा का रोल नम्बर आज भी याद है। फिर वो दिन आया जब परीक्षाफल आना था। उन दिनों अख़बार आता था जिसमे पास हुवे विद्यार्थियों के रोल नम्बर छपे होते थे। शाम 7 बजे अख़बार मिला और कई सहपाठी फेल हो गए थे। मैं खुशकिस्मत था, द्वितीय श्रेणी से पास हो गया। कुछ दिन बाद कॉलेज से अंकपत्र मिला तो ख़ुशी हुई की गणित में जिले में सर्वाधिक अंक 100 में से 90 मुझे मिले थे। खैर पढाई आगे बढ़ी और 11वीं में आ गया। इसी बीच पिताजी ने हमारे लिए लोन पर एक कंप्यूटर लिया जो की पापा के दफ्तर में था। ऑफिस जाकर पापा की मदद करता और कंप्यूटर भी सीखने लगा। वाणिज्य विषय से पढाई कर रहा था तो टैली एकाउंटिंग भी सीख ली। 12वीं भी अच्छे अंकों के साथ पास कर ली।
आगे का अगली पोस्ट में.....✍️